चिपको आंदोलन – गौरा देवी

चिपको आन्दोलन

एक पर्यावरण-रक्षा का आन्दोलन है। यह आन्दोलन तत्कालीन उत्तर प्रदेश (वर्तमान उत्तराखंड) के चमोली जिले में सन 1973 में प्रारम्भ हुआ। यह भारत के उत्तराखण्ड राज्य में किसानो ने गौरा देवी के नेतृत्व में वृक्षों की कटाई का विरोध करने के लिए किया था। वे राज्य के द्वारा वनों की कटाई का विरोध कर रहे थे और उन पर अपना परम्परागत अधिकार जता रहे थे। इस आन्दोलन के अन्य नेता प्रसिद्ध पर्यावरणविद् सुन्दरलाल बहुगुणा, चण्डीप्रसाद भट्ट थे ।

गौरा देवी

गौरा देवी  का जन्म 1925 में उत्तराखंड के लाता गाॅंव में हुआ था। इन्हे ही चिपको आन्दोलन की जननी माना जाता है। गौरा देवी का विवाह मात्र 12 वर्ष की उम्र में मेहरबान सिंह  के साथ हुआ, जो कि रेणी  गांव के निवासी थे , शादी के 10 वर्ष उपरांत मेहरबान की मृत्यु हो जाने के कारण गौरा देवी को अपने बच्चे का लालन -पालन करने में काफी दिक्कतें आई थीं। कुछ समय बाद गौरा महिला मण्डल की अध्यक्ष भी बन गई थी।
सन् 1974 में 2500 देवदार वृक्षों को काटने के लिए चिन्हित किया गया था, लेकिन गौरा देवी ने इनका विरोध किया और पेड़ोंकी रक्षा करने का अभियान चलाया, इसी कारण गौरा देवी चिपको वूमन  के नाम से जानी जाती है।

चिपको आंदोलन के प्रभाव

चिपको आंदोलन ने तब की केंद्र सरकार का ध्यान अपनी ओर खींचा था। जिसके बाद यह निर्णय लिया गया कि अगले 15 सालों तक उत्तर प्रदेश के हिमालय पर्वतमाला में एक भी पेड़ नहीं काटे जाएंगे। चिपको आंदोलन का प्रभाव उत्तराखंड से निकलकर पूरे देश पर होने लगा। इसी आंदोलन से प्रभावित होकर दक्षिण भारत में पेड़ों को बचाने के लिए एप्पिको आंदोलन नाम से  शुरू किया गया।

‘चिपको आन्दोलन’ का नारा था 

क्या हैं जंगल के उपकार, मिट्टी, पानी और बयार।

मिट्टी, पानी और बयार, जिन्दा रहने के आधार।

 

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