बिहार में राज्यपाल की संवैधानिक स्थिति

बिहार की राज्य सरकार 3 इकाइयों में विभाजित है —

  • कार्यपालिका,
  • विधायिका
  • न्यायपालिका

राज्यपाल राज्य का संवैधानिक तथा कार्यपालिका का प्रमुख होता है। राज्यपाल के पद व अधिकारों का उल्लेख  संविधान के अनुच्छेद 153 से 162 तक में किया गया है।
राज्य का समस्त प्रशासन राज्यपाल के नाम से ही संचालित होता है। इस सन्दर्भ में राज्यपाल को कुछ विशेषाधिकार प्राप्त हैं, किन्तु फिर भी वह मंत्रिपरिषद् की सलाह से कार्य करता है। सामान्यतः भारत में एक राज्य के लिए एक राज्यपाल की व्यवस्था है, लेकिन भारतीय संविधान के अनुच्छेद 153 के अनुसार  किसी एक व्यक्ति को दो या दो से ज्यादा राज्यों के राज्यपाल के रूप में नियुक्त करने का राष्ट्रपति को अधिकार प्रदान करता  है।
राज्यपाल पद के लिए योग्यताएँ

  • वह भारत का नागरिक हो।
  • उसकी उम्र कम-से-कम 35 वर्ष हो।
  • वह राज्य सरकार या केंद्र सरकार या दोनों के अधीन किसी सार्वजनिक उपक्रम में लाभ के पद पर न हो।
  • वह भारतीय संसद या किसी भी राज्य के विधानमंडल का सदस्य न हो।

राज्यपाल की नियुक्ति

राज्यपाल की नियुक्ति प्रधानमंत्री की सिफारिश पर राष्ट्रपति द्वारा 5 वर्षों के लिए की जाती है, किन्तु भारतीय संविधान के अनुच्छेद 156 के अनुसार राज्यपाल का कार्यकाल राष्ट्रपति के प्रसादपर्यंत होता है। राज्यपाल का वेतन राज्य की संचित निधि से दिया जाता है।
अनुच्छेद 158 के अनुसार राज्यपाल के वेतन, अधिकारों एवं सुविधाओं को उसकी पदावधि तक कम नहीं किया जा सकता है।

राज्यपाल के अधिकार 

भारतीय संविधान  राज्यपाल को कार्यपालिका, वैधानिक, वित्तीय, न्यायिक अधिकार प्रदान किए गए हैं तथा विशेष परिस्थितियों में विवेकाधिकार भी प्राप्त है।

कार्यपालिका संबंधी अधिकार

  • राज्यपाल द्वारा राज्य के मुख्यमंत्री की नियुक्ति की जाती है और मुख्यमंत्री की सलाह राज्यपाल अन्य सदस्यों की नियुक्ति करता हैं तथा विधानसभा के एंग्लो इंडियन समुदाय से एक सदस्य राज्यपाल द्वारा ही मनोनीत किया जाता हैं।
  • विधानपरिषद् के कुल सदस्यों की संख्या का 1/6 सदस्यों की नियुक्ति राज्यपाल द्वारा कला, साहित्य, विज्ञान और सामाजिक सेवा से जुड़े हुए लोगो में से  की जाती हैं।
  • राज्यपाल के द्वारा ही राज्य के महाधिवक्ता और राज्य लोक सेवा आयोग के सदस्यों की नियुक्ति की जाती है।

वैधानिक अधिकार

  • राज्य विधानमंडल का सत्र आहूत, सत्रावसान करने और विधानसभा को विघटित करने का अधिकार राज्यपाल को प्राप्त है।
  • राज्यपाल विधानमंडल का वार्षिक वित्त प्रतिवेदन प्रस्तुत करते हैं। राज्यपाल को धन विधेयक और अनुदान माँगों की सिफारिश करने का अधिकार है।
  • विधानमंडल द्वारा पारित विधेयक या अधिनियम राज्यपाल के हस्ताक्षर के पश्चात ही प्रभावी किया जा सकता है ।
  • संविधान के अनुच्छेद 213 से राज्यपाल को अध्यादेश जारी करने का अधिकार प्राप्त है और उसके इस अधिकार के प्रयोग को किसी भी न्यायालय में चुनौती नहीं दी जा सकती है।
  • विधानमंडल के किसी सदस्य के अयोग्यता संबंधी किसी विवाद में अंतिम निर्णय राज्यपाल का होता है, परंतु निर्णय लेने से पूर्व राज्यपाल को चुनाव आयोग का परामर्श लेना आवश्यक है।
  • संविधान के अनुच्छेद 352 (1) से राज्यपाल को देश में बाहरी आक्रमण या सैन्य विद्रोह की स्थिति में राज्य में आपातकाल लागू करने के लिए कोई भी अधिकार नहीं है।
  • अनुच्छेद 356 के तहत कुछ विशेष परिस्थितियों में राज्यपाल राज्य में राष्ट्रपति शासन की सिफारिश राष्ट्रपति से करते हैं।

वित्तीय अधिकार 

  • विधानसभा में धन विधेयक को राज्यपाल  पूर्वानुमति के पश्चात ही प्रस्तुत किया जा सकता है ।
  • राज्य की आकस्मिक निधि से धन  राज्यपाल की अनुमति से सकता है।
  • राज्यपाल को अनुदान माँगों की सिफारिश करने का अधिकार है।

 न्यायिक अधिकार 

जिला न्यायाधीशों की नियुक्ति एवं पदोन्नति राज्यपाल द्वारा की जाती हैं। राज्यपाल किसी व्यक्ति को दिए गए दंड को कम या क्षमा कर सकते हैं। राज्यपाल को राज्य के उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति का कोई अधिकार नहीं है, लेकिन राष्ट्रपति को उनकी नियुक्ति में राज्यपाल से सलाह लेने का भारतीय संविधान के अनुच्छेद 217 (1) में प्रावधान है।

 विवेकाधिकार

विधानसभा में किसी भी दल को स्पष्ट बहुमत ना मिलने की स्थिति में  राज्यपाल अपने विवेक बहुमत वाले दल के नेता को सरकार बनाने के लिए आमंत्रित करते हैं तथा राज्यपाल राष्ट्रपति को भेजे जानेवाले संदेश में स्वविवेक का प्रयोग करते हैं।

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