पौधों के विभिन्न भाग (Different Parts of the Plants)

पौधों को मुख्य रूप से तीन भागो में बाटा गया है- जड़, तना तथा  पत्ती।

1. जड़ (Root):

जड़ें प्रकाश के विपरीत गति करती हैं। जड़ें जमीन से जल व पोषक तत्वों का अवशोषण करती है। सामान्यतः जड़ दो प्रकार की होती है – मूसला जड़ (Tap Root), अपस्थानिक जड़ (Adventitious Roots)।

  1. मूसला जड़ (Tap Root): इस प्रकार की जड़ें अधिकतर (Usually) द्विबीजपत्री पौधों (Dicotyledons Plant) में पायी जाती है। इसका रूपान्तरण निम्न है-
    • शंकु आकार (Conical)- आधार की ओर मोटी तथा किनारे पर पतली होती हैं। जैसे – गाजर।
    • कुंभीरूप (Napiform)- आधार पर अधिक फुल जाने से गोलाकार तथा शीर्य एकदम पतली हो जाती है। जैसे – शलजम, चुकन्दर।
    • तुर्करूपी (Fusiform)- मध्य में फूली हुई, आधार व शीर्ष की ओर पतली। जैसे – मूली।
    • श्वसन मूल (Pneumatophores)- श्वसन के लिए द्वितीयक जड़ें ऋणात्मक गुरुत्वानुवर्ती समुद्र के लवणीय मृदा में पाये जाते हैं। जैसे – मेन्ग्रोव वनस्पति।
  2. अपस्थानिक जड़ (Adventitious Roots) : इस प्रकार की जड़ें एकबीजपत्री पौधों (monocotyledons) में पायी जाती है। इन जड़ों में मूलांकुर (radicle) बीज के अंकुरण के बाद नष्ट हो जाता है। इसके विपरीत मूलांकुर द्विबीजपत्री पौधों में मूलसला जड़ तंत्र बनाता है।

अपस्थानिक जड़ों के रूपान्तरण (Modifications of Adventitious Roots):

क्रमांक जड़ पौधे
1. रेशेदार जड (Fibrous Root) प्याज
2. ब्रायोफाइलम आरोही जड़ (Climbing Root) पान
3.  पोथोस बटरस जड़ (Bytress Root) टर्मिनेलिया(Terminalia )
4. चूषक बड़Sucking Root) अमरबेल (Dodders)
5. श्वसन जड़ (Respiratory Root) जुसिया
6. बायधीय जड़ (Aerial Root) आर्किड (Orchids)
7.  स्वांगीकृत जड़ (Assimilatory Root) टिनोस्पोरा (Tinospora)
8. परजीवी जड़ (Parasitic Root) कस्कुटा
9. मालाकार जड़ (Moniliform Root) अंगूर, करेला
10. ग्रंथिल जड़ (Nodulose Root) आमहल्दी
11. स्तंभ मूल (Prop Root) बरगद

2. स्तंभ या तना (Stem):

तना पोधे का वह भाग है जो प्रांकर (Plumule) से निकलकर गरुत्व (भूमि) से दूर प्रकाश की ओर वृद्धि करता है

तना के प्रकार (Types of Stem)

  • भूमिगत तना (Underground Stems): तने का वह भाग जो भूमि के अंदर पाया जाता है, भूमिगत तना कहलाता है। भूमिगत तने में पर्वसंधियां, पर्व कलिकाएँ तथा शल्क पत्र पाये जाते हैं। भूमिगत तना निम्न हैं 
    • स्तंभ कंद (Stem Tuber), जैसे – आलू।
    • शल्ककंद (Bulb), जैसे – प्याज, लहसून, लिली।
    • घनकंद (Corm), जैसे – बण्डा, अरबी, जिमीकंद, केसर।
    • प्रकंद (Rhizome), जैसे – हल्दी, अदरक।
  • अर्द्धवायबीय तना (Sub-aerialStems): अर्द्धवायवीय तने का कुछ भाग भूमि के अंदर तथा कुछ भाग बाहर वायु में पाया जाता है। वायवीय तने में कायिक जनन (Vegetativercpmduction) के लिए कलिकाएँ पायी जाती है जिनमें पार्श्व शाखाओं की उत्पत्ति होती है। अर्द्धवायवीय तने निम्न हैं –
    • ऊपरिभूस्तारी (Runner), जैसे – ब्रह्मी बूटी, दूब घास।
    • स्टोलॉन (Stolon), जैसे – पोदीना, जैस्मिन, स्यबेरी।
    • भूस्तारी (Offset), जैसे – जलकुम्भी, पिस्टिया।
  • वायवीय तने (Aerial Stem): जब पूरा का पूरा तना भूमि के ऊपर स्थित होता है, तो ऐसे तने को वायवीय तना कहते हैं। वायवीय तने निम्न हैं – 
    • स्तंभ प्रतान (Stem Tendril), जैसे अंगूर।
    • स्तंभ शूल (Stem Thorm), जैसे- नींबू, गुलाब, बेर।
    • पर्णाभ स्तंभ (Phylloclades जैसे – नागफनी।
    • पत्र प्रकालिका (Bulbils), जैसे – शतावर, रस्कस।

3. पत्ती (Leal):

पत्ती पौधे का एक महत्वपूर्ण अंग है जिसकी उत्पत्ति बाह्यजनित (Exogenous) होती है। यह प्रायः हरे रंग की होती है क्योंकि सर्मपितकणक (Chloroplast) पाया जाता है, जो प्रकाश संश्लेषण की क्रिया में मदद करता है। प्रकाश संश्लेषण क्रिया द्वारा पत्तियां मण्ड का निर्माण करती है।

4. पष्प (Flowers):

इसमें मुख्य रूप से बाहादल पुंज (Calyx), दलपुंज (Corolla). पुमंग (Androceium) तथा जायांग मादा जननांग हैं।

  • पुमंग (Androceium): इसमें एक या एक से अधिक पुंकेसर (Stamens) होता है। पुंकेसर में परागकण पाये जाते हैं। परागकण (Pollen Grains) नर या युग्मोदभिद् की प्रथम कोशिका होती है।
  • परागण (Pollination): पराकोषों से निकलकर अण्डप व वर्तिकान पर परागकणों के पहुंचने की प्रक्रिया को परागण कहते हैं। परागण दो तरह का होता है –
    • स्वपरागण (Self Pollination)
    • परपरागन (Cross Pollination)
  • जायांग (Gynaecium): इनमें एक या एक से अधिक फ्लास्क के समान पतली-पतली रचनाएँ होती है, जिन्हें। स्त्रीकेसर या अण्डप कहते हैं। अण्डप के तीन भाग होते हैं –
    • अण्डाशय (Ovary)
    • वर्तिकाग्र (stigma)
    • वर्षिका (Style)
  • भ्रूणपोषण (Endosperm): आवृत्तबीजी पौधों का भ्रूणपोषण त्रिगुणित होता है। भ्रूणकोप बीजक संदरे उपस्थित ऐसा पोषक ऊतक है जो बदले हुए भ्रूण और शिशु पौधे को भोजन देता है। नारियल का खौने चाला भाग भ्रूणपोष ही होता है। कुछ द्विबीज पत्री पौधों में बीजपत्र भ्रूणपोष से संपूर्ण संचित भोज्य पदार्थो को अवशोषित कर लेता है जिसमें इनमें भ्रूणपोष समाप्त हो जाता है। ऐसे बीजों को अभ्रूणपोषी बीज कहते हैं। जैसे – सेम, चना, मटर आदि।
  • अनिषेक फलन (Parthenocarpy) : कुछ पौधों में बिना निषेचन के ही अण्डाशय से फल बन जाता है। इस तरह बिना निषेचन हुए फल के विकास को अनिषेक फलन कहते हैं। ऐसे फूल बीजरहित होते हैं। जैसे – केला, पपीता, नारंगी, अंगूर, अनन्नास आदि।

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