प्लेट विवर्तनिकी (Plate Tectonics Theory)


सन् 1967 में मैकेंजी  (Mckenzie), पारकर (Parker) और मोरगन (Morgan) ने स्वतंत्रा रूप से उपलब्ध् विचारों को समन्वित कर अवधरणा प्रस्तुत की, जिसे ‘प्लेट विवर्तनिकी’ (Plate tectonics) कहा गया। एक विवर्तनिक प्लेट  ठोस चट्टान का विशाल व अनियमित आकार का खंड है, जो महाद्वीपीय व महासागरीय स्थलमंडलों से मिलकर बना है। ये प्लेटें दुर्बलतामंडल (Asthenosphere) पर एक दृढ़ इकाई के रूप में
क्षैतिज अवस्था में चलायमान हैं।  प्लेट विवर्तनिकी के सिद्धांत के अनुसार पृथ्वी का स्थलमंडल सात मुख्य प्लेटों व वुफछ छोटी प्लेटों में विभक्त है।
प्रमुख प्लेट इस प्रकार हैं –

  • आर्कटिक प्लेट (Arctic plate)
  • उत्तर अमेरिकी प्लेट (North American Plate)
  • दक्षिण अमेरिकी प्लेट (South American Plate)
  • प्रशांत महासागरीय प्लेट (Pacific Ocean Plate)
  • इंडो-आस्ट्रेलियनप्लेट (Indo-Australian Plate)
  • अफ़्रीकी प्लेट (African Plate)
  • यूरेशियाई प्लेट  (Eurasian Plate)

ग्लोब पर ये प्लेटें पृथ्वी के पूरे इतिहास काल में लगातार विचरण कर रही हैं।  महाद्वीप एक प्लेट का हिस्सा है और प्लेट चलायमान हैं।  वेगनर
के अनुसार आरंभ में, सभी महाद्वीपों से मिलकर बना एक सुपर महाद्वीप (Super continent) के रूप में विद्यमान था।  प्लेट संचरण के फलस्वरूप तीन प्रकार की प्लेट सीमाएँ बनती हैं।

अपसारी सीमा (Divergent boundaries)

जब दो प्लेट एक दूसरे से विपरीत दिशा में अलग हटती हैं और नई पर्पटी का निर्माण होता है। उन्हें अपसारी प्लेट कहते हैं। वह स्थान जहाँ से प्लेट एक दूसरे से दूर हटती हैं, इन्हें प्रसारी स्थान (Spreading site) भी कहा जाता है। अपसारी सीमा का सबसे अच्छा उदाहरण मध्य-अटलांटिक कटक है। यहाँ से अमेरिकी प्लेटें उत्तर अमेरिकी व दक्षिण अमेरिकी प्लेटें तथा यूरेशियन
व अफ़्रीकी प्लेटें अलग हो रही हैं।

अभिसरण सीमा (Convergent boundaries)

जब एक प्लेट दूसरी प्लेट के नीचे धँसतीं है और जहाँ भू-पर्पटी नष्ट होती है, वह अभिसरण सीमा है। वह स्थान जहाँ प्लेट धँसतीं हैं, इसे प्रविष्ठन क्षेत्र (Subduction zone) भी कहते हैं। अभिसरण तीन प्रकार से हो सकता है-

  • महासागरीय व महाद्वीपीय प्लेट के बीच 
  • दो महासागरीय प्लेटों के बीच 
  • दो महाद्वीपीय प्लेटों के बीच।

रूपांतर सीमा (Transform boundaries)

जहाँ न तो नई पर्पटी का निर्माण होता है और न ही पर्पटी का विनाश होता है, उन्हें रूपांतर सीमा कहते हैं। इसका कारण है कि इस सीमा पर प्लेटें एक दूसरे के साथ-साथ क्षैतिज दिशा में सरक जाती हैं। रूपांतर भ्रंश (Transform faults) दो प्लेट को अलग करने वाले तल हैं जो
सामान्यतः मध्य-महासागरीय कटकों से लंबवत स्थिति में पाए जाते हैं। क्योंकि कटकों के शीर्ष पर एक ही समय में सभी स्थानों पर ज्वालामुखी उद्गार नहीं होता, ऐसे में पृथ्वी के अक्ष से दूर प्लेट के हिस्से भिन्न प्रकार से गति करते हैं। इसके अतिरिक्त पृथ्वी के घूर्णन का भी प्लेट के अलग
खंडों पर भिन्न प्रभाव पड़ता है।

प्लेट प्रवाह दरें (Rates of plate movement)

सामान्य व उत्क्रमण चुंबकीय क्षेत्र की पट्टियाँ जो मध्य-महासागरीय कटक के सामानांतर हैं, प्लेट प्रवाह की दर समझने में वैज्ञानिक के लिए सहायक सिद्ध हुई हैं। प्रवाह की ये दरें बहुत भिन्न हैं। आर्वफटिक कटक की प्रवाह दर सबसे कम है (2.5 सेंटीमीटर प्रति वर्ष से भी कम )। ईस्टर द्वीप के निकट पूर्वी प्रशांत महासागरीय उभार, जो चिली से 3,400 Km पश्चिम की ओर दक्षिण प्रशांत महासागर में है, इसकी प्रवाह दर सर्वाधिक है जो 5 Cm प्रति वर्ष से भी अधिक है।

प्लेट को संचलित करने वाले बल (Forces for the plate movement)

सागरीय अध्स्तल विस्तार और प्लेट विवर्तनिक-दोनों सिद्धांतों ने इस बात पर बल दिया कि पृथ्वी का ध्ररातल व भूगर्भ दोनों ही स्थिर न होकर गतिमान हैं। प्लेट विचरण करती है-यह आज एक अकाट्य तथ्य है। ऐसा माना जाता है कि दृढ़ प्लेट के नीचे चलायमान चट्टानें वृत्ताकार रूप में चल रही हैं। उष्ण पदार्थ ध्ररातल पर पहुँचता है, पैफलता है और धीरे-धीरे ठंडा होता है फिर गहराई में जाकर नष्ट हो जाता है। यही चक्र बारंबार दोहराया जाता है और वैज्ञानिक इसे संवहन प्रवाह (Convection flow) कहते हैं। पृथ्वी के भीतर ताप उत्पत्ति के दो माध्यम हैं-

  • रेडियोधर्मी तत्वों का क्षय (Decay of radioactive elements)
  • अवशिष्ट ताप  (Residual heat)

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