भारत में जनजातीय क्षेत्रों की समस्याएँ व समाधान

भारत में जनजातीय क्षेत्रों में आने वाली मुख्य समस्याएँ निम्नलिखित है –

भूमि पर अधिकारों में आती कमी

अंग्रेजों के आगमन से पूर्व भूमि पर  जनजातियों का पूर्ण अधिकार था परंतु उनके आगमन व स्वतंत्रता के पश्चात् तथा वन कानूनों से भूमि पर उनका अधिकार छिनता चला गया जिनसे इनकी संस्कृति प्रभावित हुई।

विस्थापन की समस्या

विभिन्न विकास योजनाओं उद्योग धंधों के निर्माण के कारण से जनजातियों पर विपरीत असर पड़ा है एवं वे बड़ी संख्या में विस्थापित होने को बाध्य हुए हैं।

गैर-आदिवासी जनसंख्या का प्रभाव

आदिवासी क्षेत्रों में तेजी से बढ़ती गैर-आदिवासी जनसंख्या से उनकी सामाजिक, आर्थिक स्थिति प्रभावित हुई है एवं उनमें जनांकिकीय परिवर्तन हुए हैं। महाजनी, शोषण बढ़ने से वे कर्ज के जाल में फंस गए हैं, जिनकी काफी तीखी प्रतिक्रिया भी हुई है। एवं इस क्षेत्र में अशांति का वातावरण बना है।
आदिवासी क्षेत्रों में उसका जनसंख्या संतुलन भी बिगड़ रहा है। 1961 ई. में झारखंड क्षेत्र में कुल आदिवासी जनसंख्या लगभग 50% थी जो 1991 ई. में घटकर लगभग 29% हो गयी।

लिंग-आधारित समस्या 

गैर-आदिवासियों द्वारा सामाजिक-आर्थिक शोषण के कारण आदिवासी महिलाओं के शोषण की समस्या उभरी है।

सांस्कृतिक विलगाव

विस्थापन, जनांकिकी परिवर्तन आदि के कारण सांस्कृतिक रूप से उनकी प्राकृतिक जीवन-शैली पर असर पड़ा है जिनसे ये जनजातियाँ प्रभावित हुई हैं।

शिक्षा सम्बंधी समस्या

विभिन्न जनजातियों में निरक्षरता अभी भी है, जिससे उनमें रूढ़िवादिता की प्रवृत्ति पायी जाती है। साक्षरता व शिक्षा के अभाव के कारण उनकी श्रम उत्पादकता का मूल्य कम है तथा वे महाजनी शोषण का भी शिकार हो जाते हैं।

भारत में जनजातीय क्षेत्रों की समस्याओं का समाधान

स्वतंत्रता के पश्चात् से ही आदिवासियों के विकास हेतु विभिन्न योजनाएँ बनाई जाती रही हैं परंतु पाँचवीं योजना में जनजातीय उप-योजना के आने के पश्चात् इस प्रक्रिया में तेजी आई है। इसके तहत समेकित जनजातीय विकास कार्यक्रम (Integrated Tribal Development Programme – ITDP) के अंतर्गत 193 परियोजनाएँ चलाई जा रही हैं, जिससे 50% जनजातीय जनसंख्या लाभान्वित हो रही है।
ये परियोजनाएँ जिला व विकास प्रखंडों में चलाई जा रही हैं। संशोधित क्षेत्र विकास अभिकरण (Modified Area Development Agency-MADA) के अंतर्गत 249 परियोजनाएँ ऐसे केन्द्रों में चलाई जा रही हैं, जहाँ की अधिकतम जनसंख्या 10,000 तक हो तथा जिसमें 50% से अधिक जनसंख्या जनजातीय हो।
आदिम जनजातीय समूह के विकास के लिए 74 जनजातियों को पहचाना गया है एवं इनके लिए 14 राज्यों एवं केन्द्रशासित राज्यों में सूक्ष्म परियोजनाएं चलाई जा रही हैं।
जनजातीय उत्पादन के विपणन के लिए TRIFED (Tribal Federation) बनाया गया है जो कि उन्हें उनके उत्पादन का लाभप्रद मूल्य उपलब्ध कराता है।
स्थानीय संसाधनों के आधार पर जनजातियों के विकास को गरीबी निवारण कार्यक्रम IRDP का अंग बनाया गया है। उनमें शिक्षा के विकास के साथ-साथ उन्हें महाजनी शोषण से बचाने का प्रयास किया जा रहा है एवं उनकी सांस्कृतिक पहचान को बनाए रखने पर बल दिया जा रहा है।
नई राष्ट्रीय जनजाति नीति नेहरूवियन एप्रोच पर आधारित है। इसमें शिक्षा, स्वास्थ्य सुविधा, पुनर्वास, भूमि-जुड़ाव पर जोर दिया गया है। जनजातीय भाषा का संरक्षण व लेखांकन, प्राथमिक स्तर पर मातृभाषा में शिक्षा को प्रोत्साहन तथा संयुक्त वन प्रबंधन में जनजातीय भागीदारी को प्रोत्साहन देना शामिल है।
जनजातियों को सूचना का अधिकार प्रदान किया गया है ताकि वे ग्रामीण स्तर पर भूमि-दस्तावेजों से संबंधित सूचनाएं प्राप्त कर सके। अनुसूचित जनजाति तथा वनवासी अधिकार विधेयक के अंतर्गत जनजातियों के भूमि संबंधी अधिकारों को बढ़ाया गया है।
मध्य प्रदेश के अमरकंटक में इंदिरा गांधी राष्ट्रीय जनजातीय विश्वविद्यालय खोला गया है, जो जनजातियों, से संबंधित विभिन्न अध्ययनों पर केन्द्रित होगा। इससे उनकी विशेषताओं के संबंध में जागरूकता बढ़ेगी एवं संवेदनशील प्रयासों के द्वारा उन्हें मुख्य धारा में लाना संभव होगा।


अनुसूचित जाति एवं जनजाति (अत्याचार निवारण) संशोधन नियम, 2016 
14 अप्रैल, 2016 को सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय द्वारा अनुसूचित जाति एवं जनजाति संशोधित नियम, 2016 की अधिसूचना जारी की गई। इसमें निम्न प्रावधान किए गए —

  • विशेष अदालतों को अपराध का प्रत्यक्ष संज्ञान लेने की शक्ति प्रदान करना और जहाँ तक संभव हो आरोप पत्र दाखिल करने की तिथि से दो महीने के अंदर सुनवाई पूरी करना।
  • अत्याचार से प्रभावित व्यक्ति या उसके परिवारजनों को निर्धारित आर्थिक मदद 7 दिनों के अंदर दी जाएगी।
  • अत्याचार के शिकार व्यक्तियों व गवाहों की सुरक्षा का प्रबंध करना।
  • बलात्कार एवं सामूहिक बलात्कार जैसे अपराधों के लिए राहत का प्रावधान।
  • हत्या या सामूहिक बलात्कार जैसे मामलों में राहत राशि बढ़ा कर क्रमशः रु० 75,000 से रु० 750,000 और रु० 85,000 से 25000 तक (लगभग 10% की वृद्धि) कर दी गई है। राहत राशि में बदलाव अपराध की संगीनता पर निर्भर करता है।

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