प्राचीन बिहार में सामाजिक एवं धार्मिक सुधार आंदोलन

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ऋग्वैदिक काल (1500-1000 ई.पू.) के अंतिम चरण में सामाजिक जीवन में कई प्रकार की कुरीतियों आने लगीं। ऋगवेद के दसवें मंडल के पुरुष सूक्त में पहली बार वर्ण-व्यवस्था का उल्लेख हुआ है, जो उत्तर-वैदिक काल का अंत होते-होते अपने जटिल स्वरूप में आ गयी। छठी सदी तक छुआछूत जैसे कुरीतियाँ कठोर रूप ग्रहण कर चुकी थीं। ऋग्वैदिक काल में महिलाओं की स्थिति अच्छी थी, जबकि उत्तर-वैदिक काल का अंतिम चरण आते-आते दयनीय महिलाओं की स्थिति हो गई थी।
उत्तर-वैदिक काल में लोहे के प्रयोग कृषि क्षेत्र में वृद्धि होने लगी जिसके कारण सामाजिक एवं आर्थिक जीवन में भी जटिलता आने लगी। कृषि क्षेत्र में वृद्धि के कारण पशुओं की माँग में भी वृद्धि हुई, जबकि उत्तरवैदिक काल में हो रहे यज्ञों में पशुबलि दी जाती थी। इस काल के अंतिम चरण में (छठी सदी ई.पू.) सामाजिक जटिलता, कर्मकांड, छुआछत. अस्पृश्यता आदि के विरोध में सामाजिक एवं धार्मिक सुधार आंदोलन हुआ। इन आंदोलन के प्रमुख कारण निम्नलिखित थे

  •  वर्ण-व्यवस्था की जटिलता एवं तनावपूर्ण सामाजिक जीवन।
  •  धार्मिक जीवन से असंतोष।
  •  नए धार्मिक विचारों का उदय।
  •  नई अर्थव्यवस्था का प्रभाव।।

इस समय वैदिक धर्म के विरोध में  अनेक नास्तिक एवं अनीश्वरवादी संप्रदायों का उदय हुआ। केवल उत्तर भारत में लगभग 62 संप्रदायों का उदय हुआ, जिनमें बौद्ध धर्म एवं जैन धर्म प्रमुख हैं। इन दोनों संप्रदायों की जन्मभूमि एवं कर्मभूमि बिहार ही रही है तथा इन दोनों ही धर्मों ने सामाजिक अस्पृशयता का विरोध किया जिस कारण लोग इन धर्मों की तरफ आकर्षित हुए ।
जैन धर्म व महावीर

  • इस धर्म के 24वें तीर्थंकर महावीर का जन्म 540 ई. में कुंडग्राम (वैशाली) में हुआ था |
  • इनके पिता का नाम सिद्धार्थ, जबकि माता का नाम त्रिशला था।
  •  42 वर्ष की आयु में ऋजुपालिका नदी के तट पर इन्हें ज्ञान की प्राप्ति हुई।
  • 72 वर्ष की उम्र में राजगृह के समीप (पावापुरी) 468 ई.पू. में इन्हें निर्वाण प्राप्ति हुई।

बौद्ध धर्म 

  • बौद्ध धर्म के प्रवर्तक गौतम बुद्ध का जन्म लुंबिनी में हुआ था। इनके बचपन का नाम सिद्धार्थ था।
  • इनकी पत्नी का नाम यशोधरा जबकि पुत्र का नाम राहुल था।
  •  इनको 35 वर्ष की आयु में बोधगया में निरंजना नदी (फल्गु) के तट पर ज्ञान की प्राप्ति हुई।
  •  इस घटना को संबोधी कहा जाता है।

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