ज्वालामुखी और ज्वालामुखी स्थलाकृतियाँ

ज्वालामुखी / क्रेटर (Crater) वह स्थान है जहाँ से निकलकर गैस, राख और तरल चट्टानी पदार्थ, लावा पृथ्वी के धरातल तक पहुँचता है। यदि यह पदार्थ कुछ समय पहले ही बाहर आया हो या अभी निकल रहा हो तो वह ज्वालामुखी सक्रिय ज्वालामुखी (active volcano) कहलाता है। तरल चट्टानी पदार्थ दुर्बलता मण्डल से निकलकर धरातल पर पहुँचता है। जब तक यह पदार्थ मैंटल के ऊपरी भाग में है, यह मैग्मा कहलाता है। जब यह भूपटल (earth crust) के ऊपर या धरातल पर पहुँचता है तो लावा कहा जाता है। वह पदार्थ जो धरातल पर पहुँचता है, उसमें लावा प्रवाह, लावा के जमे हुए टुकड़ों का मलवा (Pyroclastic debris) ज्वालामुखी बम, राख, धूलकण व गैसें जैसे- नाइट्रोजन यौगिक, सल्फर यौगिक और कुछ मात्रा में क्लोरीन, हाइड्रोजन व आर्गन शामिल होते हैं।
ज्वालामुखी उद्गार (Exclamation) की प्रवृत्ति और धरातल पर विकसित आकृतियों के आधार पर ज्वालामुखियों को वर्गीकृत किया
जाता है। कुछ मुख्य ज्वालामुखी निम्न प्रकार से हैं:-

  • शील्ड ज्वालामुखी (Shield volcanoes)
  • मिश्रित ज्वालामुखी (Composite volcanoes)
  •  ज्वालामुखी कुंड (Caldera)
  • बेसाल्ट प्रवाह क्षेत्र (Flood basalt provinces)

शील्ड ज्वालामुखी (Shield volcanoes)

बेसाल्ट प्रवाह को छोड़कर, पृथ्वी पर पाए जाने वाले सभी ज्वालामुखियों में शील्ड ज्वालामुखी सबसे विशाल है। जैसे – हवाई द्वीप (Hawaiian Islands) के ज्वालामुखी , ये ज्वालामुखी मुख्यतः बेसाल्ट से निर्मित होते हैं जो तरल लावा के ठंडे होने से बनते हैं। यह लावा उद्गार जैसे समय बहुत तरल होता है। इसी कारण इन ज्वालामुखियों का ढाल तीव्र नहीं होता। यदि किसी तरह निकास नालिका (Vent) से पानी भीतर चला जाए तो ये ज्वालामुखी विस्फोटक भी हो जाते है। अन्यथा कम विस्फोटक होना ही इनकी विशेषता है। इन ज्वालामुखियों से लावा फव्वारे वेफ रूप में बाहर आता है और निकास पर एक शंकु (Cone) बनाता है, जो सिंडर शंकु (Cone) के रूप में विकसित होता है।

मिश्रित ज्वालामुखी  (Composite volcanoes)


इन ज्वालामुखियों से बेसाल्ट की अपेक्षा अधिक ठंडे व श्यान (गाढ़ा या चिपचिपा) लावा उद्गार होते हैं। प्रायः ये ज्वालामुखी भीषण विस्फोटक होते हैं। इनसे लावा के साथ भारी मात्रा में ज्वलखण्डाश्मि (Pyroclastic) पदार्थ व राख भी ध्रातल पर पहुँचती हैं। यह पदार्थ निकास नली वेफ आस-पास परतों के रूप में जमा हो जाते हैं जिनके जमाव मिश्रित ज्वालामुखी के रूप में दिखते हैं।

ज्वालामुखी कुंड ( Volcanoes Caldera)

ये पृथ्वी पर पाए जाने वाले सबसे अधिक विस्फोटक ज्वालामुखी हैं। आमतौर पर ये इतने विस्फोटक होते हैं कि जब इनमें विस्फोट होता है तब वे ऊंचा ढाँचा बनाने के बजाय स्वयं नीचे धंस जाते हैं। धंसे हुए विध्वंस गर्त (लावा के गिरने से जो गड्ढे बनते हैं) ही ज्वालामुखी कुंड कहलाते हैं। इनका यह विस्फोटक रूप बताता है कि इन्हें लावा प्रदान करने वाले मैग्मा के भंडार न केवल विशाल हैं, बल्कि इनके बहुत पास स्थित हैं।
इनके द्वारा निर्मित पहाड़ी मिश्रित ज्वालामुखी की तरह प्रतीत होती है।

बेसाल्ट प्रवाह क्षेत्र (Flood basalt provinces)

ये ज्वालामुखी अत्यधिक तरल लावा उगलते हैं जिसका विस्तार दूर तक होता है । इनमें लावा प्रवाह क्रमानुसार होता है और वुफछ प्रवाह 50 meter से भी अधिक मोटे हो जाते हैं। कई बार अकेला प्रवाह सैकड़ों KM दूर तक फैल जाता है। भारत का दक्कन ट्रैप, जिस पर वर्तमान महाराष्ट्र पठार (Maharashtra Plateau) का ज्यादातर भाग पाया जाता है, वृहत् बेसाल्ट लावा प्रवाह क्षेत्र है।

मध्य-महासागरीय कटक ज्वालामुखी (Mid-ocean curtain volcano)

इन ज्वालामुखियों का उद्गार महासागरों में होता है। मध्य महासागरीय कटक एक शृंखला है जो 70000 Km से अध्कि लंबी है और जो सभी महासागरीय बेसिनों में फैली है। इस कटक के मध्यवर्ती भाग में लगातार उद्गार होता रहता है।

ज्वालामुखी स्थलाकृतियाँ (Volcanic Landforms)

अंतर्वेधी आकृतियों (Intravenous shapes)

ज्वालामुखी उद्गार से जो लावा निकलता है, उसके  ठंडा होने से आग्नेय शैल बनती हैं। लावा का यह जमाव या तो ध्ररातल पर पहुँच कर होता है या ध्ररातल तक पहुँचने से पहले ही भू-पटल (Earth Crust) के नीचे शैल परतों में ही हो जाता है। लावा के ठंडा होने के स्थान के आधर पर आग्नेय शैलों का वर्गीकरण किया जाता है : –

  • ज्वालामुखी शैलों (Volcanic shells) – जब लावा ध्ररातल पर पहुँच कर ठंडा होता है
  • पातालीय शैल (Plutonic Shell) – जब लावा ध्रातल के नीचे ही ठंडा होकर जम जाता है।
  • जब लावा भू-पटल के भीतर ही ठंडा हो जाता है तो कई आकृतियाँ बनती हैं। ये आकृतियाँ अंतर्वेधी आकृतियाँ (Intrusive forms)
    कहलाती हैं।

बैथोलिथ (Batholiths)

यदि मैग्मा का बड़ा पिंड भू-पर्पटी में अधिक गहराई पर ठंडा हो जाए तो यह एक गुंबद के आकार में विकसित हो जाता है। अनाच्छादन प्रक्रियाओं के द्वारा ऊपरी पदार्थ के हट जाने पर ही यह ध्ररातल पर प्रकट होते हैं। ये विशाल क्षेत्र में फैले होते हैं और कभी-कभी इनकी गहराई भी कई Km तक होती है। ये ग्रेनाइट के बने पिंड हैं। इन्हें बैथोलिथ कहा जाता है जो मैग्मा भंडारों के जमे हुए भाग हैं।

लैकोलिथ (Lacoliths)

ये गुंबदनुमा विशाल अंतर्वेधी चट्टानें (Intravenous rock) हैं जिनका तल समतल व एक पाइप रूपी वाहक नली से नीचे से जुड़ा होता है। इनकी आकृति ध्ररातल पर पाए जाने वाले मिश्रित ज्वालामुखी के गुंबद से मिलती है। अंतर के वल यह होता है कि लैकोलिथ गहराई में पाया
जाता है। कर्नाटक के पठार में ग्रेनाइट चट्टानों (Granite rocks) की बनी ऐसी ही गुंबदनुमा पहाड़ियाँ हैं। इनमें से अधिक्तर अब अपपत्रित (Exfoliated) हो चुकी हैं व ध्ररातल पर देखी जा सकती हैं।

लैपोलिथ, फैकोलिथ व सिल (Lapolith, phacolith and sills)

ऊपर उठते लावे का कुछ भाग क्षैतिज दिशा में पाए जाने वाले कमजोर ध्ररातल में चला जाता है। यहाँ यह अलग-अलग आकृतियों में जम जाता है। यदि यह तश्तरी (Saucer) के आकार में जम जाए, तो यह लैपोलिथ कहलाता है। कई बार अंतर्वेधी आग्नेय चट्टानों (Intestine igneous rock) की मोड़दार अवस्था में अपनति (Anticline) के ऊपर व अभिनति (Syncline) के तल में लावा का जमाव पाया जाता है। ये परतनुमा/लहरदार चट्टानें एक निश्चित वाहक नली से मैग्मा भंडारों से जुड़ी होती हैं। जो क्रमशः बैथोलिथ में विकसित होते हैं यह ही फैकोलिथ
कहलाते हैं।
अंतर्वेधी आग्नेय चट्टानों का क्षैतिज तल में एक चादर के रूप में ठंडा होना सिल या शीट कहलाता है। जमाव की मोटाई के आधर पर इन्हें विभाजित किया जाता है कम मोटाई वाले जमाव को शीट व घने मोटाई वाले जमाव सिल कहलाते हैं।

डाइक (Dike)

जब लावा का प्रवाह दरारों में ध्रातल के लगभग समकोण होता है और अगर यह इसी अवस्था में ठंडा हो जाए तो एक दीवार की भाँति संरचना बनाता है। यही संरचना डाइक कहलाती है।

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